तख्त श्री दमदमा साहिब का इतिहास क्या हैं? कौन थे बाबा बीर सिंह और धीर सिंह ?
दमदमा साहिब सिख धर्म के पाँच तख्तों (धार्मिक सत्ता के केंद्र) में से एक है। यह पंजाब के बठिंडा जिले के तलवंडी साबो में स्थित है।
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गुरुद्वारा दमदमा साहिब |
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय के जुल्मी सरकार के खिलाफ लड़ते हुए 1704 ईस्वी में आनंदपुर साहिब को छोड़कर चमकौर साहिब, माछीवाड़ा, दीना कांगड़, मुक्तसर साहिब, लखी जंगल, पक्का- पथराला आदि स्थानों से होते हुए इस स्थान पर 1705 ईस्वी में पहुंचे। गुरुजी ने यहां पर करीर के पेड़ों के झुंड के साथ घिरी हुई एक ऊंची जगह पर अपना कमर कस्सा खोलकर दम (सांस) लिया। जिससे इस स्थान का नाम दमदमा साहिब प्रसिद्ध हुआ। इस स्थान पर गुरु गोबिन्द सिंह जी लगभग सवा साल से ज्यादा समय तक रहे।
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गुरु गोबिन्द सिंह और बाबा दीप सिंह जी के शस्त्र |
यह दर्पण गुरु गोबिन्द सिंह जी का हैं। इस पवित्र दर्पण से मर्यादा के अनुसार तीन दिन तक दर्शन मात्र से लकवे रोग से ग्रस्त चेहरे ठीक हो जाते हैं।
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दर्पण |
बाबा बीर सिंह ,बाबा धीर सिंह और बंदूक की परख
इसी स्थान पर गुरु गोबिन्द सिंह जी ने बंदूक के निशाने की परख भी की गई और अपने सिखों की परीक्षा भी ली।
दमदमा साहिब में गुरु गोबिन्द सिंह जी के दर्शनों के लिए श्रधालु दीवान में आ रहे थे। उस समय लाहौर का निवासी उधे सिंह गुरु जी के दर्शन को आया और गुरु गोबिन्द सिंह जी को एक बंदूक भेंट की। उस समय गुरु साहिब जी के पास चोधरी डल्ला जी अपने सिपाहियो के साथ बैठे हुए थे।
भाई उधे सिंह की बंदूक को देखते हुए गुरु साहिब ने कहा कि बंदूक बहुत अच्छी है और अब इसका निशाना लगा कर देखते है। गुरुजी ने कहा, भाई डल्ला जी आप अपने दो सिपाहियो को सामने खड़ा करे। हम निशाना लगा कर देखना चाहते हैं। यह सुन कर भाई डल्ला जी के सभी सिपाही घबरा गया और कोई अपनी जगह से नही उठा और न कोई बंदूक के सामने आया।
तब गुरु गोबिन्द सिंह जी ने, तबेले में काम करने वाले बीर सिंह और धीर सिंह को संदेश भेजा कि उनको बोलो गुरु साहिब को निशाना लगाना है, वह जल्दी से आ जाएं। जब बीर सिंह व धीर सिंह के पास संदेश पहुंचा तो वह उस समय अपनी पगड़ी को बांध रहे थे और संदेश सुनते ही आधी पगड़ी को हाथ में लेकर वे एक-दूसरे से आगे निकलते हुए गुरु साहिब के पास आ गए। दोनों ने गुरु साहिब को अपील करी कि गुरु साहिब जी उन पर निशाना लगा कर देखें।
यह देखकर भाई डल्ला अपनी आंखों के सामने यह सब कुछ होता हुआ देख रहे थे। वह हैरान हो गए कि कोई गोली खाने के लिए कैसे बंदूक के सामने खड़ा हो सकता है। गुरु के प्रति अथाह श्रद्धा देखकर डल्ला जी ने अमृत की दात प्राप्त और भाई डल्ला सिंह जी बने।
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गुरुद्वारा बाबा बीर सिंह और धीर सिंह |
जिस स्थान पर बाबा बीर सिंह व धीर सिंह निशाने के लिए खड़े हुए थे वहीं पर गुरुद्वारा बाबा बीर सिंह और धीर सिंह स्थापित किया गया है।
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